श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.20.54 
अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा
त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ।
अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौ:
सुदुर्बला वत्समिवाभिकांक्षया॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
'हे चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख वाले श्री राम, यदि मैं मरूँ ही नहीं, तो आपके बिना यहाँ अपना जीवन क्यों व्यर्थ गँवाऊँ? पुत्र! जिस प्रकार गाय दुर्बल होकर भी लोभ के कारण अपने बछड़े के पीछे-पीछे चलती है, उसी प्रकार मैं भी आपके साथ वन में जाऊँगी।'
 
'O Shri Ram, whose face is as beautiful as the moon, if I do not die, then why should I waste my life here without you? Son! Just as a cow, despite being weak, follows its calf out of greed, in the same way I will also go to the forest with you.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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