श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  2.20.52 
इदं तु दु:खं यदनर्थकानि मे
व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि।
तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया
सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
‘सबसे अधिक दुःख तो यह है कि पुत्र के सुख के लिए मैंने जो व्रत, दान और संयम किया था, वह सब व्यर्थ हो गया। पुत्र के कल्याण के लिए मैंने जो तप किया था, वह भी बंजर भूमि में बोए गए बीज के समान निष्फल हो गया।॥52॥
 
‘The most sad thing is that all the fasts, charity and self-control that I did for the happiness of my son have gone in vain. The penance that I did for the welfare of my child has also become fruitless like a seed sown in a barren land.॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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