श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.20.5 
अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम्।
यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'यह बड़े खेद की बात है कि हमारे महाराज अपनी बुद्धि खो बैठे हैं। इस समय वे सम्पूर्ण चराचर जगत का विनाश करने पर तुले हुए हैं, इसीलिए वे समस्त प्राणियों के जीवन आधार श्री राम को त्याग रहे हैं।'॥5॥
 
'It is a matter of great regret that our Maharaja has lost his wisdom. At this time he is hell-bent on destroying the entire living world, that is why he is abandoning Shri Ram, the life support of all beings.'॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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