श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.20.47 
अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम्।
कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविका॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'पूर्णिमा के समान सुन्दर आपके मुख को देखे बिना मैं यह दुःखमय जीवन कैसे जी पाऊँगा?' 47
 
'Without seeing your beautiful face which is like the full moon, how will I continue with this miserable life?' 47
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd