श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.20.46 
तदक्षयं महद्दु:खं नोत्सहे सहितुं चिरात्।
विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णापि राघव॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
'राघव! अब इस वृद्धावस्था में मैं अपनी सहधर्मिणीयों का तिरस्कार तथा उससे उत्पन्न असीम दुःख अधिक समय तक सहन नहीं कर सकता।
 
'Raghava! Now in this old age I cannot tolerate the scorn of my co-wives and the immense unending sorrow caused by it for much longer.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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