श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.20.44 
नित्यक्रोधतया तस्या: कथं नु खरवादि तत्।
कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
'बेटा! इस दयनीय स्थिति में आकर मैं कैकेयी का मुख कैसे देख सकूँगा, जो अपने क्रोधी स्वभाव के कारण सदैव कठोर वचन बोलती रहती हैं?
 
'Son! Having fallen into this pitiable condition how will I be able to look at the face of Kaikeyi who always speaks harsh words due to her short-tempered nature?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd