श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.20.43 
यो हि मां सेवते कश्चिदपि वाप्यनुवर्तते।
कैकेय्या: पुत्रमन्वीक्ष्य स जनो नाभिभाषते॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
'जो लोग मेरी सेवा करते हैं या मेरा अनुसरण करते हैं, वे भी कैकेयी के पुत्र को देखकर चुप हो जाते हैं और मुझसे बात नहीं करते ॥ 43॥
 
'Even those who serve me or follow me become quiet on seeing Kaikeyi's son and do not speak to me. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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