श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.20.42 
अत्यन्तं निगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता।
परिवारेण कैकेय्या: समा वाप्यथवावरा॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
'मुझे अपने पति से हमेशा घोर तिरस्कार या कठोर फटकार ही मिली है, मुझे कभी प्रेम या सम्मान नहीं मिला। मेरे साथ कैकेयी की दासियों के बराबर या उनसे भी बदतर व्यवहार किया जाता है।
 
‘I have always received extreme disdain or harsh rebukes from my husband, I have never received any love or respect. I am treated as equal to Kaikeyi's maids or even worse than them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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