श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.20.38 
न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे।
अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'बेटा राम! एक वृद्ध पत्नी को अपने पति के राज में जो सुख और कल्याण मिलना चाहिए, वह मुझे कभी नहीं मिला। मैं तो यही सोचती थी कि बेटे के राज में मुझे सारे सुख मिल जाएँगे और अब तक इसी आशा में जी रही हूँ।'
 
‘Son Ram! I have never experienced the happiness and well-being that an elderly wife should experience during the reign of her husband. I used to think that I will experience all the happiness in my son's reign and I have lived with this hope till now.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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