श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.20.37 
एक एव हि वन्ध्याया: शोको भवति मानस:।
अप्रजास्मीति संतापो न ह्यन्य: पुत्र विद्यते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'बेटा! बांझ स्त्री को मानसिक दुःख होता है। उसके मन में यही दुःख रहता है कि उसके कोई संतान नहीं है, इसके अतिरिक्त उसे और कोई दुःख नहीं है।
 
'Son! A barren woman suffers from a mental grief. She has this sorrow in her mind that she has no child, apart from this she has no other sorrow.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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