श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.20.31 
स षट् चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने।
आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'अतः मैं चौदह वर्ष तक निर्जन वन में रहूँगा और वन में उपलब्ध छाल आदि खाकर केवल कंद-मूल और फल खाकर निर्वाह करूँगा।'
 
'Therefore I shall stay in the deserted forest for fourteen years and shall live on bark etc., which are available in the forest, and shall subsist only on roots and fruits.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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