श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.20.30 
भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति।
मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'राजा भरत को युवराज का पद दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्य भेज रहे हैं।'
 
‘The king is giving the position of crown prince to Bharat and making me an ascetic is sending me to Dandakaranya. 30.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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