श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.20.3 
कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा।
तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघव:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'रघुनाथजी जन्म से ही हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करते थे जैसा वे अपनी माता कौशल्या के साथ करते थे॥3॥
 
'Raghunathji, right from his birth, always behaved with us in the same way as he behaved with his mother Kausalya.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)