श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.20.28 
गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे।
विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थित:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
अब मैं दण्डकारण्य जाऊँगा, तो इतने महँगे आसन की क्या ज़रूरत है? अब तो कुशा बिछाकर बैठने का समय आ गया है।
 
‘Now I will go to Dandakaranya, so what is the need for such a costly seat? Now the time has come for me to sit on a kusha mat.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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