श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.20.22 
तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मन:।
कौसल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वच:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
उस समय पुत्र-प्रेमवश कौसल्यादेवी ने अपने दुर्जय पुत्र श्री रामचन्द्रजी से यह प्यारी और हितकारी बात कही- 22॥
 
At that time, Kausalya Devi, out of love for her son, said this lovely and beneficial thing to her formidable son Shri Ramchandraji - 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)