श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 19: श्रीराम का वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.19.5 
हितेन गुरुणा पित्रा कृतज्ञेन नृपेण च।
नियुज्यमानो विस्रब्ध: किं न कुर्यामहं प्रियम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
राजा मेरे शुभचिन्तक, गुरु, पिता और कृतज्ञ हैं। उनकी अनुमति से उनका ऐसा कौन-सा प्रिय कार्य है, जिसे मैं निःसंदेह न कर सकूँ?॥5॥
 
‘The king is my well-wisher, teacher, father and grateful to me. With his permission, what is that favourite work of his which I cannot do without any doubt?॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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