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श्लोक 2.19.22  |
न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| 'अपने पिता की सेवा करने अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं है ॥ 22॥ |
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| 'There is no other religious practice in the world more important than serving one's father or obeying his orders. ॥ 22॥ |
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