श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 19: श्रीराम का वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.19.17 
धिक्कष्टमिति नि:श्वस्य राजा शोकपरिप्लुत:।
मूर्च्छितो न्यपतत् तस्मिन् पर्यङ्के हेमभूषिते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कैकेयी के वचन सुनकर शोक में डूबे हुए राजा दशरथ ने आह भरकर कहा, ‘मुझे धिक्कार है! हाय! यह तो बड़ा दुःख है!’ यह कहकर वे स्वर्ण शय्या पर मूर्छित होकर गिर पड़े।
 
On hearing Kaikeyi's words, King Dasaratha, who was drowned in grief, sighed and said, 'Shame on me! Alas! This is very painful!' Having said this, he fell unconscious on the golden bed.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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