श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का कैकेयी से पिता के चिन्तित होने का कारण पूछना,कैकेयी का कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वरों का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.18.7 
अचिन्त्यकल्पं नृपतेस्तं शोकमुपधारयन्।
बभूव संरब्धतर: समुद्र इव पर्वणि॥ ७॥
 
 
अनुवाद
राजा का दुःख असह्य था। इस दुःख का कारण क्या है, यह सोचकर श्री रामचन्द्रजी पूर्णिमा के दिन समुद्र की भाँति अत्यन्त व्याकुल हो गए॥7॥
 
The king's grief was beyond possibility. Thinking about what is the reason for this grief, Shri Ramchandraji became extremely disturbed like the sea on a full moon day. 7॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd