श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम का कैकेयी से पिता के चिन्तित होने का कारण पूछना,कैकेयी का कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वरों का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.18.21 
प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते।
तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'तुम उसे प्रिय हो, वह तुम्हारे लिए अप्रिय बात कहने के लिए अपनी जीभ नहीं खोलता; परन्तु जो वचन उसने मुझसे किया है, उसे तुम्हें अवश्य पूरा करना होगा॥ 21॥
 
'You are dear to him, he does not open his tongue to say anything unpleasant to you; but you must fulfill the promise he made to me.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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