श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 17: श्रीराम का राजपथ की शोभा देखते और सुहृदों की बातें सुनते हुए पिता के भवन में प्रवेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.17.13 
न हि तस्मान्मन: कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात्।
नर: शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेऽपि राघवे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
(जो एक बार श्री रामजी को देख लेता था, वह सदा देखता ही रहता था।) श्री रघुनाथजी के चले जाने पर भी कोई अपना मन या दृष्टि उन परम पुरुष से हटा नहीं सकता था। ॥13॥
 
(Whoever looked at Sri Rama once would keep looking at him forever.) Even when Sri Raghunatha went away, no one could take their mind or sight away from the Supreme Being. ॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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