श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 16: सुमन्त्र का श्रीराम को महाराज का संदेश सुनाना,श्रीराम का मार्ग में स्त्री पुरुषों की बातें सुनते हुए जाना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.16.29 
मेघनादमसम्बाधं मणिहेमविभूषितम्।
मुष्णन्तमिव चक्षूंषि प्रभया मेरुवर्चसम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
उस रथ की घरघराहट मेघ की गर्जना के समान प्रतीत होती थी। उसमें स्थान की कोई संकीर्णता नहीं थी। वह विशाल था और रत्नों तथा स्वर्ण से विभूषित था। उसकी आभा स्वर्णमय मेरु पर्वत के समान प्रतीत होती थी। वह रथ अपनी प्रभा से लोगों की आँखों में एक प्रकार की चकाचौंध उत्पन्न करता था। 29।
 
The rattling sound of that chariot seemed like the deep roar of a cloud. There was no narrowness of space in it. It was spacious and was adorned with gems and gold. Its luster seemed like the golden Mount Meru. That chariot used to create a kind of dazzle in the eyes of the people with its radiance. 29.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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