श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 16: सुमन्त्र का श्रीराम को महाराज का संदेश सुनाना,श्रीराम का मार्ग में स्त्री पुरुषों की बातें सुनते हुए जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.16.23 
दीक्षितं व्रतसम्पन्नं वराजिनधरं शुचिम्।
कुरङ्गशृङ्गपाणिं च पश्यन्ती त्वां भजाम्यहम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'आप राजसूय यज्ञ में दीक्षित हों, उचित व्रतों का पालन करने में तत्पर हों, उत्तम मृगचर्म धारण करें, शुद्ध हों और हाथ में मृग का सींग धारण करें; तथा आपको इस रूप में देखकर मैं आपकी सेवा में तत्पर रहूँ - यही मेरी शुभ कामना है॥ 23॥
 
'May you be initiated into the Rajasuya Yajna, prepared to observe the appropriate vows, clothed in the finest deerskin, pure and holding a deer's horn in your hand; and seeing you in this form, may I remain engaged in your service - this is my good wish.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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