श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 15: सुमन्त्र का राजा की आज्ञा से श्रीराम को बुलाने के लिये उनके महल में जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.15.34 
गन्धान् मनोज्ञान् विसृजद् दार्दुरं शिखरं यथा।
सारसैश्च मयूरैश्च विनदद्भिर्विराजितम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वह भवन मलयाचल के निकट चंदन पर्वत दर्दुर की चोटी के समान मनोहर सुगंध बिखेर रहा था। सारस और मोर आदि पक्षियों का कलरव उसकी शोभा बढ़ा रहा था।
 
That building was spreading a lovely fragrance all around like the peak of the sandalwood mountain Dardur near Malayachal. The chirping of cranes and birds like peacock were adding to its beauty.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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