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श्लोक 2.14.63  |
तद् गच्छ त्वरितं सूत राजपुत्रं यशस्विनम्।
राममानय भद्रं ते नात्र कार्या विचारणा॥ ६३॥ |
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| अनुवाद |
| अतः हे सूत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शीघ्र जाकर यशस्वी राजकुमार श्री राम को यहाँ ले आओ। इस विषय में तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए।॥ 63॥ |
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| ‘Therefore, Suta! May you be blessed. Go immediately and bring the illustrious prince Shri Ram here. You should not think otherwise in this matter.'॥ 63॥ |
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