श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  2.14.58-59 
ततस्तु राजा तं सूतं सन्नहर्ष: सुतं प्रति॥ ५८॥
शोकरक्तेक्षण: श्रीमानुद्वीक्ष्योवाच धार्मिक:।
वाक्यैस्तु खलु मर्माणि मम भूयो निकृन्तसि॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
उस समय पुत्र-वियोग की आशंका से उनका सुख नष्ट हो गया था। शोक के कारण उनके नेत्र लाल हो गए थे। उस धर्मात्मा राजा ने सारथि की ओर एक बार देखकर इस प्रकार कहा - 'ऐसी बातें कहकर तुम मेरे मन को और भी अधिक कष्ट क्यों पहुँचा रहे हो?'॥58-59॥
 
At that time, his happiness had been destroyed by the possibility of separation from his son. His eyes had become red due to grief. That virtuous king looked at the charioteer once and said thus - 'Why are you hurting my feelings even more by saying such things?'॥ 58-59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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