श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  2.14.57-58h 
एवं तस्य वच: श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमिवार्थवत्॥ ५७॥
अभ्यकीर्यत शोकेन भूय एव महीपति:।
 
 
अनुवाद
सुमन्त्र के कहे हुए ये सान्त्वनापूर्ण और अर्थपूर्ण वचन सुनकर राजा दशरथ पुनः शोक से व्याकुल हो गए ॥57 1/2॥
 
Hearing these consoling and meaningful words spoken by Sumantra, King Dasharatha again became grief-stricken. 57 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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