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श्लोक 2.14.57-58h  |
एवं तस्य वच: श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमिवार्थवत्॥ ५७॥
अभ्यकीर्यत शोकेन भूय एव महीपति:। |
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| अनुवाद |
| सुमन्त्र के कहे हुए ये सान्त्वनापूर्ण और अर्थपूर्ण वचन सुनकर राजा दशरथ पुनः शोक से व्याकुल हो गए ॥57 1/2॥ |
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| Hearing these consoling and meaningful words spoken by Sumantra, King Dasharatha again became grief-stricken. 57 1/2॥ |
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