श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.14.51 
उत्तिष्ठ सुमहाराज कृतकौतुकमङ्गल:।
विराजमानो वपुषा मेरोरिव दिवाकर:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उठिए और उत्सव की विधि पूर्ण करके वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर सिंहासन पर बैठिए। तब आप मेरु पर्वत पर उदित होते हुए सूर्य के समान शोभा पाते रहिए। 51॥
 
'Maharaj! Get up and after completing the festive auspicious rituals, sit on the throne with your body adorned with clothes and ornaments. Then may you continue to be as beautiful as the Sun rising above Mount Meru. 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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