श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.14.50 
आदित्य: सह चन्द्रेण यथा भूतधरां शुभाम्।
बोधयत्यद्य पृथिवीं तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे सूर्य और चन्द्रमा समस्त प्राणियों की आधारशिला शुभ पृथ्वी को जगाते हैं, वैसे ही आज मैं तुम्हें जगा रहा हूँ।॥50॥
 
‘Just as the Sun and the Moon awaken the auspicious Earth, which is the foundation of all beings, so today I am awakening you.॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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