श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.14.47 
यथा नन्दति तेजस्वी सागरो भास्करोदये।
प्रीत: प्रीतेन मनसा तथा नन्दय नस्तत:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जैसे सूर्योदय के समय समुद्र अपनी लहरों से प्रसन्न होकर उसमें स्नान करने वालों को आनन्द देता है, वैसे ही आप भी प्रसन्न होकर प्रसन्न मन से हम सेवकों को आनन्द प्रदान करें॥ 47॥
 
'Maharaj! Just as at sunrise the glorious sea itself becomes delighted with its waves of joy and gives pleasure to those who wish to bathe in it, in the same way you yourself become happy and with a happy heart give pleasure to us servants.॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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