श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.14.43 
इति तस्य वच: श्रुत्वा सूतपुत्रो महाबल:।
स्तुवन् नृपतिशार्दूलं प्रविवेश निवेशनम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
वशिष्ठजी के ये वचन सुनकर महाबली सूत के पुत्र सुमन्त्र उनकी प्रशंसा करते हुए राजा दशरथ के महल में प्रविष्ट हुए॥43॥
 
Hearing these words of Vashishthaji, Sumantra, the son of Mahabali Suta, entered the palace of King Dasharatha praising him.43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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