श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 14: कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम को बुलाना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  2.14.17-18 
व्याहन्तास्यशुभाचारे यदि रामाभिषेचनम्॥ १७॥
न शक्तोऽद्यास्म्यहं द्रष्टुं दृष्ट्वा पूर्वं तथामुखम्।
हतहर्षं तथानन्दं पुनर्जनमवाङ्मुखम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'पापी! यदि तू श्री रामजी के अभिषेक में विघ्न डालेगा (तो तुझे मेरे लिए जल से तर्पण करने का कोई अधिकार नहीं रहेगा) । श्री रामजी के राज्याभिषेक के समाचार से मैंने पहले जो प्रजा का हर्ष से भरा हुआ मुख देखा था, आज उसी प्रजा का हर्ष और प्रसन्नता से रहित, लटका हुआ मुख नहीं देख सकूँगा । 17-18॥
 
'Sinful! If you create obstacles in the consecration of Shri Ram (then you will have no right to offer water sacrifice for me). Having seen the uplifted face of the people, full of joy, that I have seen earlier due to the news of the coronation of Shri Ram, today I will not be able to see the same people's face hanging down, void of joy and happiness. 17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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