श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 13: राजा का विलाप और कैकेयी से अनुनय-विनय  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.13.25 
तत: स राजा पुनरेव मूर्च्छित:
प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम्।
समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति
क्षितौ विसंज्ञो निपपात दु:खित:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जब उनकी प्रिय कैकेयी इतनी विनती करने पर भी प्रसन्न न हो सकीं और नकारात्मक बातें करती रहीं, तब अपने पुत्र के वनवास का विचार करके राजा पुनः शोक के कारण अचेत हो गए और अपनी सुध-बुध खोकर भूमि पर गिर पड़े।
 
When his beloved Kaikeyi could not be appeased even after so many requests and continued to speak negatively, then thinking of his son's exile, the King again became unconscious due to grief and lost his senses and fell down on the ground.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas