श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.12.95 
कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहु:।
पद‍्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
मेरे पराक्रमी पुत्र राम तो रथ, हाथी और घोड़ों पर सवार होकर प्रायः भ्रमण करते थे, अब वे उस विशाल वन में पैदल कैसे चलेंगे?॥95॥
 
'My mighty son Rama used to travel frequently in chariots, elephants and horses. How will he now walk on foot in that vast forest?॥ 95॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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