श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  2.12.94 
त्वं राजपुत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि।
अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुव: परिभवश्च मे।
सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
‘राजकुमारी! मेरे दुर्भाग्य के कारण तुम मेरे घर में आकर बस गई हो। तुम्हारे कारण मैं संसार में पापी के समान समस्त प्राणियों से अपूर्व अपकीर्ति, तिरस्कार और उपेक्षा अवश्य प्राप्त करूँगा।॥ 94॥
 
‘Princess! You have come and settled in my house due to my misfortune. Because of you, I will surely get unparalleled infamy, contempt and disregard from all living beings like a sinner in the world.॥ 94॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd