श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  2.12.92 
प्रियं चेद् भरतस्यैतद् रामप्रव्राजनं भवेत्।
मा स्म मे भरत: कार्षीत् प्रेतकृत्यं गतायुष:॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
यदि भरत को भी राम का वन में भेजा जाना अच्छा लगता है तो मेरी मृत्यु के पश्चात् वे मेरे शरीर का दाह संस्कार न करें। ॥92॥
 
"If Bharata also likes this sending of Rama to the forest, then after my death he should not cremate my body." ॥92॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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