श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.12.87 
राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम्।
मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
यदि रघुनन्दन राम वन को चले जाएँ, तो मुझ अक्षम्य अपराधी को, जो सबके द्वारा निन्दित होने का पात्र बन गया है, मृत्यु अवश्य ही यमलोक में भेज देगी। 87
 
If Raghunandan Rama departs for the forest, then death will surely send me, the unpardonable criminal who has become the object of condemnation of everyone, to the abode of Yama. 87
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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