श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.12.81 
रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये।
बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
'जैसे बालक एकान्त में खेलते हुए काले सर्प को हाथ में पकड़ लेता है, वैसे ही मैंने एकान्त में तुम्हारे साथ खेलते हुए तुम्हारा आलिंगन किया है; परन्तु उस समय मुझे यह नहीं मालूम था कि तुम एक दिन मेरी मृत्यु का कारण बनोगे॥ 81॥
 
'Just as a child while playing in solitude catches a black snake in his hand, similarly I have embraced you while playing with you in solitude; but at that time I did not realize that you will one day become the cause of my death.॥ 81॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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