श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  2.12.80 
चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता।
अज्ञानादुपसम्पन्ना रज्जुरुद‍्बन्धनी यथा॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
'पापी! मैंने पापी होकर भी बहुत समय तक अज्ञानवश तुम्हारी रक्षा की और तुम्हें हृदय से लगाया; किन्तु आज तुम मेरे गले का फाँसी का फंदा बन गये हो।
 
‘Sinner! I, a sinner, protected you for a long time and embraced you out of ignorance; but today you have become the noose around my neck.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)