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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना
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श्लोक 8-9h
श्लोक
2.12.8-9h
सदा ते जननीतुल्यां वृत्तिं वहति राघव:॥ ८॥
तस्यैवं त्वमनर्थाय किंनिमित्तमिहोद्यता।
अनुवाद
'श्री रामचन्द्रजी ने तुम्हें सदैव अपनी माता के समान माना है; फिर तुम उन्हें हानि पहुँचाने पर क्यों तुली हो?' 8 1/2
'Sri Ramachandra has always treated you like his own mother; then why have you become so determined to harm him?' 8 1/2
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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