श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  2.12.79 
अहो दु:खमहो कृच्छ्रं यत्र वाच: क्षमे तव।
दु:खमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम्॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
'हाय! कैसा दुःख! कैसी पीड़ा! मुझे आपके ये वचन सहने पड़ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह मेरे पूर्वजन्म के पापों का अशुभ फल है, जो मुझे इतना महान दुःख मिला है॥ 79॥
 
‘Oh! What a sorrow! What a pain! I have to endure these words of yours. It seems as if this is the inauspicious result of the sins I committed in my previous life, that such great sorrow has befallen me.॥ 79॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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