श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.12.77 
अनृतैर्बत मां सान्त्वै: सान्त्वयन्ती स्म भाषसे।
गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधी:॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
'अब तक तुम मुझे जो भी दिलासा और आश्वासन के मीठे शब्द कहते थे, वे सब झूठ थे। जैसे शिकारी मधुर संगीत से हिरण को आकर्षित करता है और फिर उसे मार डालता है, वैसे ही तुम भी पहले मुझे फुसला रहे हो और फिर मेरी जान ले रहे हो।
 
'Till now whatever sweet words of comfort and assurance you used to say to me were all lies. Just like a hunter attracts the deer with sweet music and then kills it, in the same way you are luring me first and then taking my life.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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