श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 74-75
 
 
श्लोक  2.12.74-75 
नहि राममहं दृष्ट्वा प्रवसन्तं महावने॥ ७४॥
चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम्।
सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
'श्रीराम को विशाल वन में रहते और मिथिला की पुत्री सीता को विलाप करते देखकर मैं अधिक समय तक जीवित नहीं रहना चाहती। ऐसी स्थिति में तुम्हें विधवा होकर अपने पुत्र के साथ अयोध्या पर शासन करना होगा।'
 
'I do not wish to live much longer seeing Shri Ram living in the vast forest and Mithila's daughter Sita crying. In such a situation you must become a widow and rule Ayodhya with your son.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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