श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 73-74h
 
 
श्लोक  2.12.73-74h 
वैदेही बत मे प्राणान् शोचन्ती क्षपयिष्यति॥ ७३॥
हीना हिमवत: पार्श्वे किंनरेणेव किंनरी।
 
 
अनुवाद
जब वह श्री राम के लिए विलाप करने लगेगी, तब वह मेरे प्राणों का नाश कर देगी। उसका दुःख देखकर मेरे प्राण इस शरीर में नहीं टिक पाएँगे। उसकी दशा हिमालय की ढलान पर अपने स्वामी से वियोगी किन्नरी के समान हो जाएगी।
 
‘When she will start mourning for Shri Ram, she will destroy my life. Seeing her grief, my life will not be able to remain in this body. Her condition will become like that of a Kinnari who was separated from her master on the side of Himalayas. 73 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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