श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 68-70h
 
 
श्लोक  2.12.68-70h 
यदा यदा च कौसल्या दासीव च सखीव च॥ ६८॥
भार्यावद् भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति।
सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा॥ ६९॥
न मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव।
 
 
अनुवाद
'हाय! वह मधुरभाषी कौसल्या, जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है, जब-जब मुझे प्रसन्न करने की इच्छा से दासी, सखी, पत्नी, बहिन और माता के समान मेरी सेवा करने आई, तब-तब मैंने उस देवी का भी आदर नहीं किया, जो तुम्हारे कारण आदर के योग्य थी।
 
'Alas! Whenever that sweet-talking Kausalya, whose son is dearest to me the most, came to serve me like a maidservant, friend, wife, sister and mother with the desire to please me, I never honored even that goddess who deserved to be honored because of you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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