श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 63-64h
 
 
श्लोक  2.12.63-64h 
तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भि: सह निश्चिताम्॥ ६३॥
कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम्।
 
 
अनुवाद
'मैंने अपने मित्रों के साथ विचार-विमर्श करके श्री राम का अभिषेक करने का निश्चय कर लिया है, मेरा यह मन शुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त हो गया है; अब शत्रुओं से हारी हुई सेना के समान इसे मैं कैसे पीछे लौटता हुआ देखूँगा?॥ 63 1/2॥
 
'I have decided to anoint Shri Ram after discussing with my friends, this mind of mine has been inclined towards auspicious deeds; now how will I see it turned back like an army defeated by the enemies?॥ 63 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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