श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 62-63h
 
 
श्लोक  2.12.62-63h 
रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम्।
कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते॥ ६२॥
मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दुमुपप्लुतम्।
 
 
अनुवाद
'क्योंकि मेरे विचार से धर्मपालन की दृष्टि से भरत श्री राम से श्रेष्ठ हैं। श्री राम को वन जाने के लिए कहने पर जब उनके मुख की कान्ति राहु से प्रभावित चन्द्रमा के समान फीकी पड़ जाएगी, तब मैं उनके उदास मुख को कैसे देख सकूँगा?॥62 1/2॥
 
'Because in my opinion, Bharata is superior to Shri Ram in terms of upholding Dharma. After telling Shri Ram to go to the forest, when the glow of his face will fade like the moon affected by Rahu, then how will I be able to look at his sad face?॥ 62 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd