श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  2.12.60 
यदि भर्तु: प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च।
नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
'हे क्रूर स्वभाव और पापमय विचारों वाली दुष्ट स्त्री! यदि तू अपने पति, सम्पूर्ण जगत् और भरत से प्रेम करना चाहती है, तो इस कुबुद्धि को त्याग दे ॥60॥
 
'You wicked woman with a cruel nature and sinful thoughts! If you want to love your husband, the whole world and Bharata as well, then give up this evil intention. ॥ 60॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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