श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  2.12.58-59 
बालायास्तत् त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत्।
कुतो वा ते भयं जातं या त्वमेवंविधं वरम्॥ ५८॥
राष्ट्रे भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने।
विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे बचपन में जो शील था, वह अब मुझे बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है। तुम्हें किस बात का भय है कि तुम ऐसा वरदान माँग रहे हो? भरत राज्य सिंहासन पर बैठें और श्रीराम वन में रहें - यही तुम माँग रहे हो। यह बहुत ही मिथ्या और नीच विचार है। तुम्हें अब भी इससे दूर रहना चाहिए।' 58-59
 
‘The modesty you had in your childhood is now looking quite different from what I see. What are you afraid of that you are asking for such a boon? Bharat should sit on the throne of the kingdom and Shri Ram should stay in the forest – this is what you are asking for. This is a very false and mean idea. You should desist from this even now. 58-59.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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