श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 12: महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.12.57 
भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्ती मां न लज्जसे।
शीलव्यसनमेतत् ते नाभिजानाम्यहं पुरा॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
'लगता है कि तुम्हारा मन किसी दुष्टात्मा के प्रभाव से दूषित हो गया है। तुम मुझसे ऐसी बातें कहते हुए लज्जित क्यों नहीं होतीं, मानो किसी प्रेत-ग्रस्त स्त्री के समान हो? मुझे पहले यह पता नहीं था कि तुम्हारा कुल-योग्य शील इस प्रकार नष्ट हो गया है।' 57.
 
‘It seems that your mind has been contaminated by the influence of some evil spirit. Why are you not ashamed of saying such things to me like a woman possessed by a demon? I was not aware earlier that your family-worthy modesty has been destroyed in such a way. 57.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd